Arthur Ashe की प्रेरणादायक कहानी : मैं ही क्यों | inspirational story in hindi

Arthur Ashe की प्रेरणादायक कहानी : मैं ही क्यों | inspirational story in hindi :  

नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है मेरी इस पोस्ट Arthur Ashe की प्रेरणादायक कहानी : मैं ही क्यों inspirational story in hindi में , दोस्तों जब भी हम दुखी या परेशान होते है तो भगवान से शिकायत करते है , ” मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है ” , ” मैं ही क्यों ” . तो इसका एक महान नज़रिये से भरा जवाब जानते है आर्थर ऐश की कहानी के जरिये।

Arthur Ashe (आर्थर ऐश) का परिचय –

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पूरा नाम आर्थर रोबर्ट ऐश ( Arthur Robert Ashe)
जन्म 10 जुलाई , 1943
जन्म स्थान  रिचमंड , अमेरिका
देश अमेरिका
प्रोफ़ेशन टेनिस खिलाड़ी
मृत्यु 6 फ़रवरी , 1993

Arthur Ashe की प्रेरणादायक कहानी inspirational story in hindi-

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जैसा की आपने Arthur Ashe के बारे जाने वे कौन है। अब हम कहानी को विस्तार से जानेंगे। Arthur Ashe अंतरराष्टीय (international) टेनिस में खेलने वाले सर्वप्रथम अफ़्रीकी अमेरिकन खिलाड़ी थे। Arthur Ashe एकमात्र अश्वेत पुरुष खिलाडी है, जिन्होंने Australian Open , French Open , Wimbledon  और US Open ख़िताब अपने नाम किया।

उनके शानदार टेनिस करियर के दौरान उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ भी आया। जब 80 के दशक में उनकी heart bypass Surgery हुई  , और इस operation में Arthur Ashe (आर्थर ऐश ) को जो खून चढ़ाया गया, दुर्भाग्यवश वह HIV पॉजिटिव था और जिससे Arthur Ashe (आर्थर ऐश ) HIV संक्रमित हो गए।

जब सब को Arthur Ashe (आर्थर ऐश ) की इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का पता चला , तो विश्व भर से उनके लिए सहानुभूति भरे पत्र आने लगे। एक दिन उन्हें एक पत्र मिला ,  जिसमे लिखा था की भगवान ने आपको इतनी बुरी बीमारी देने के लिए चुना , क्या आपके मन में यह प्रश्न नहीं आता की   ” मैं ही क्यों  ”  इस पत्र को पढ़ कर Arthur मुस्कुराये और जानते है उन्होंने क्या जवाब दिया।

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उनके इस जवाब ने उन्हें महान लोगो की श्रेणी में ला कर खड़ा कर दिया। Arthur Ashe ने जवाब में लिखा –

 पूरी दुनिया में 5 करोड़ बच्चे tennis खेलना शरू करते है , जिनमे से 50 लाख बच्चे ही tennis की शिक्षा लेते है। जिसमे से 5 लाख बच्चे ही Professional Tennis ट्रेनिंग तक पहुँते है. फिर जिनमे से 50 हज़ार सफल हो कर सर्किट तक आ पाते है, इसमें 5000 Grand Slam तक जाते है,  जिनमे 50 Wimbledon (विंबलडन) पहुँते है.. जिसके बाद 4 semifinals और आखिरी  2 लोग finals में आते है 

जब मैंने उस विजय कप को हाथ में पकड़ा हुआ था तब भगवान से मैंने कभी नहीं पूछा –      ” मैं ही क्यों “

और जब आज मैं दर्द में हूँ तो भगवान से नहीं पूछना चाहिए – ” मैं ही क्यों ” 

कितनी सकारात्मक सोच क्या महान नजरिया हैं दोस्तों जब खुशियों के समय , सफलताओ के समय नहीं कहा ” मैं ही क्यों ” तो फिर मुश्किल समय में भी क्यों कहुँ ” मैं ही क्यों ” .

दोस्तों जब इंसान के अंदर कर्तज्ञ , शुक्रगुजार , आभारी होने का नजरिया होता है , शुक्र करने की आदत होती है , फिर उसे उन चीज़ो की, लोगो की उन अवसरों ,की कीमत का पता होता है जो उसे मिली है फिर उसे किसी चीज़ की शिकायत नहीं होती। फिर सुख और दुःख में वो एक जैसा रहता है.

यह कहानी आपको कैसी लगी comment box में जरूर बताइयेगा , और अपने दोस्तों के साथ social media पर शेयर भी कीजिएगा। ..Thank you.

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