Story of Munshi Premchand in Hindi – ईदगाह

Story of Munshi Premchand – ईदगाह : भारत के महान लेखक एवं महान विचराक मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के एक छोटे से गाँव लमही में हुआ। और आज हम उनके जन्म दिवस के मौके पर हम आपके साथ सांझा करने जा रहे है उनकी एक यादगार कहानी ईदगाह .

मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

ईदगाह – Story of Munshi Premchand in Hindi

Story of munshi premchand
Story of munshi premchand

रमजान के पुरे तीस रोजो के बाद ईद आयी। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है , खेतो में कुछ अजीब रौनक है , आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो , कितना प्यारा , कितना शीतल है , यानि संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही है। किसी के कुर्ते में बटन नहीं है , पड़ोस के घर में सुई – धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जुटे कड़े हो गए है , उनमे तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी – जल्दी बैलो को सानी – पानी दे दे। ईदगाह से लौटते – लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता , फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना – भेंटना, दोपहर से पहले लौटना असंभव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न है। किसी ने एक रोजा रखा, वह भी दोपहर तक , किसी ने वह भी नहीं , लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोजे बड़े – बूढ़ो के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे , आज वह आ गयी ,अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हे गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन ! सेवैयों के लिए दूध और शक़्कर घर में है या नहीं , इनकी बला से , ये तो सेवैयाँ खाएंगे। वह क्या जाने की अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे है, ” Story of munshi premchand “

उन्हें क्या खबर कि चौधरी आँखे बदल ले , तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाये। उनकी अपनी जेबो में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार – बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते है और खुश हो कर फिर रख लेते है। महमूद गिनता है , एक -दो , दस , -बारह , उसके पास बारह पैसे है। मोहसिन के पास एक , दो , तीन , आठ , नौ , पन्द्रह पैसे है। इन्ही अनगिनती पैसो में अनगिनती चीज़े लायेंगे – खिलौने , मिठाइयाँ , बिगुल , गेंद और जाने क्या – क्या। और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार – पाँच साल का गरीब – सूरत , दुबला – पतला लड़का , जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ ना क्यों पीली होती – होती एक दिन मर गयी। किसी को पता क्या बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था ? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी और जब ना सहा गया तो संसार से विदा हो गयी। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रुपये कमाने गये है। बहुत सी थैलियाँ ले कर आएंगे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से बड़ी अच्छी – अच्छी लाने गयी है , इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बहुत बड़ी चीज़ है , और फिर बच्चों की आशा ! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है।

हामिद के पाँव में जूते नहीं है , सर पर एक पुरानी – धुरानी टोपी है , जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आयेंगी , तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा , मोहसिन , नूरे और सम्मी कहा से उतने पैसे निकलेंगे। अभागी अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन , उसके घर में दाना नहीं ! आज आबिद होता , तो क्या इसी तरह ईद आती और चली जाती ! इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को ? इस घर में उसका काम नहीं , लेकिन हामिद ! उसे किसी के जीने – मरने से क्या मतलब ? उसके अंदर प्रकाश है और बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दल – बल लेकर आये , हामिद की आनंद- भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी। हामिद भीतर जा कर दादी से कहता है – तुम डरना है अम्माँ , मैं सबसे पहले आऊंगा। बिलकुल ना डरना, ” Story of munshi premchand “

अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने – अपने बाप के साथ जा रहे है। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है ! उसे कैसे अकेले मेले जाने दे ? उस भीड़ – भाड़ में बच्चा कही खो जाये तो क्या हो ? नहीं , अमीना उसे यों ना जाने देगी। नन्ही -सी जान ! तीन कोस चलेगा कैसे ? पैर में छाले पड़ जायेंगे। जूते भी तो नहीं है। वह थोड़ी – थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती , लेकिन यह सेवैयाँ कौन पकायेगा ? पैसे होते तो लौटते – लौटते सब समाग्री जमा कर झटपट बना लेती। यह तो घंटो चीज़े जमा करते लगेंगे। माँगे का ही तो भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपडे सिले थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सर पर सवार हो गयी तो क्या करती ? हामिद के लिए कुछ नहीं है , तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे है। तीन पैसे हामिद की जेब में , पाँच अमीना के बटवे में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार , अल्लाह ही बेडा पार लगावे। धोबन और नाइन और मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आयेंगी। सभी को सेवैयाँ चाहिए और थोड़ा किसी को आँखों नहीं लगता। किस – किस से मुँह चुरायेगी ? और मुँह क्यों चुराये ? साल भर का त्यौहार है। ज़िन्दगी खैरियत से रहे , उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखे , ये दिन भी कट जायेंगे।

गाँव से मेला चला। और बच्चो से साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब के सब दौड़ कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों इंतज़ार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे – धीरे चल रहे है ? हामिद के पैरो में तो जैसे पर लग गए है। वह कभी थक सकता है ? शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरो के बगीचे है। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और लीचियाँ लगी हुई है। कभी – कभी कोई लड़का कंकड़ उठा कर आम पर निशाना लगाता है। माली अंदर से गली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फलर्ग पर है। खूब हँस रहे है। माली को कैसा उल्लू बनाया है। (Story of munshi premchand )

बड़ी -बड़ो इमारतें आने लगी। यह अदालत है , यहाँ कॉलेज है , यहाँ क्लब – घर है। इतने बड़े कॉलेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे ? सब लड़के नहीं है जी ! बड़े – बड़े आदमी है , सच ! उनकी बड़ी – बड़ी मूँछे है। इतने बड़े हो गए , अभी तक पढ़ने जाते है। ना जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर ! हामिद के मदरसे में दो – तीन बड़े – बड़े लड़के है , बिलकुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते है , काम से जी चुराने वाले। इस जगह में उसी तरह के लोग होंगे और क्या। क्लब – घर में जादू होता है। सुना है , यह मुर्दो की खोपड़ियां दौड़ती है। और बड़े – बड़े तमाशे , पर किसी को अंदर जाने नहीं देते। और वहाँ शाम को साहब लोग खेलते है , मूँछो दाढ़ी वाले। और मेमे भी खेलती है , सच ! हमारी अम्माँ को यह दे दो , क्या नाम है ,बैट , तो उसे पकड़ ही ना सके। घुमाते ही लुढ़क जाये।

महमूद ने कहा – हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँपने लगे अल्लाह कसम।

मोहसिन बोला – चलो , मनों आटा पीस डालती है ! ज़रा – सा बैट पकड़ लेगी , तो हाथ काँपने लगेंगे ! सैकड़ो घड़े रोज पानी निकालती है। पाँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े , तो आँखों तले अँधेरा आ जाये।

महमूद – लेकिन दौड़ती तो नहीं , उछल – कूद तो नहीं सकती।

मोहसिन – हाँ , उछल – कूद तो नहीं सकती , लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गयी थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी , अम्माँ इतनी तेज़ दौड़ी कि मैं उन्हें न पा सका, सच।

आगे चले। हलवाइयों की दुकाने शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थी। इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है ? देखो न , एक -एक दुकान पर मनों होगी। सुना है रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते है। अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दुकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है , वह तुलवा लेता है और सचमुच के रुपये देता है , बिलकुल ऐसे ही रुपये। ( Story of munshi premchand )

हामिद को यकीन न आया – ऐसे रुपये जिन्नात को कहाँ से मिल जायेंगे ?

मोहसिन ने कहा – जिन्नात को रुपये की क्या कमी ? जिस खजाने में चाहे चले जाये। लोहे के दरवाज़े तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब , आप है किस फेर में ! हीरे जेवरात तक उनके पास रहते है। जिससे खुश हो गये , उसे टोकरों जेवरात दे दिए। अभी यही बैठे है पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाये।

हामिद ने फिर पूछा – जिन्नात बहुत बड़े – बड़े होते है ?

मोहसिन – एक -एक सर आसमान के बराबर होता है जी ! ज़मीन पर खड़ा हो जाये तो उसका सर आसमान से जा लगे , मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाये।

हामिद – लोग उन्हें कैसे खुश रखते होंगे ? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिन्न को खुश कर लूँ .

मोहसिन – अब यह तो मैं नहीं जानता , लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत – से जिन्नात है। कोई चीज़ चोरी हो जाये चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे और चोर का नाम बता देंगे। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए , कही ना मिला तब झक मर के चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरंत बता दिया , मवेशीखाने में है और वही मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते है, ” Story of munshi premchand “

अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है। आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यही से कांस्टेबल कवायद करते है। रैटन ! फाय फो ! रात को बेचारे घूम – घुमाकर पहरा देते है , नहीं चोरियाँ हो जाये। मोहसिन ने प्रतिवाद किया – यह कांस्टेबल पहरा देते है ? तभी तुम बहुत जानते हो अजी हजरत , यह चोरी करते है। शहर के जितने चोर – डाकू है , सब इनसे मिले रहते है। रात को ये लोग चोरो से तो कहते है चोरी करो और आप दूसरे मोहल्ले में जा कर ‘ जागते रही ! जागते रहो !’ पुकारते है। तभी इन लोगो के पास इतने रुपये आते है। मेरे मामू एक थाने में कांस्टेबल है। बीस रुपये महीना पाते है , लेकिन पचास रुपये घर भेजते है। अल्लाह कसम ! मैंने एक बार पूछा था की मामू , आप इतने रुपये कहाँ से पाते है ? हँसकर कहने लगे – बेटा , अल्लाह देता है। फिर आप हे बोलो – हम लोग चाहे तो एक दिन लाखों मार लाये। हम तो इतना ही लेते है। जिसमे अपनी बदनामी ना हो और नौकरी न चली जाये।

हामिद ने पूछा – ये लोग चोरी करवाते है , तो कोई इन्हे पकड़ता नहीं ?

मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला – अरे पागल ! इन्हे कौन पकड़ेगा ! पकड़ने वाले तो यह लोग खुद है , लेकिन अल्लाह। इन्हे सजा भी खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए , मामू के घर में आग लग गयी। सारी लेई – पूंजी जल गयी। एक बर्तन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोये , अल्लाह कसम , पेड़ के नीचे ! फिर ना जाने कहाँ से एक सौ क़र्ज़ लाये तो बर्तन – भांडे आये।

हामिद – एक सौ तो पचास से ज्यादा होते है ?

‘कहाँ पचास , कहाँ एक सौ। पचास एक थैली -भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी ना आये ?

अब बस्ती घनी होने लगी। ईदगाह जानेवालों की टोलियाँ नज़र आने लगी। एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के – ताँगे पर सवार , कोई मोटर पर , सभी इत्र में बेस , सभी के दिलो में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा – सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर , संतोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीज़े अनोखी थी। जिस चीज़ की ओर ताकते , ताकते ही रह जाते और पीछे से बार -बार हॉर्न की आवाज़ होने पर भी नहीं चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते – जाते बचा। ” Story of munshi premchand “

सहसा ईदगाह नज़र आयी। ऊपर इमली के घने वृक्षो की छाया।नीचे पक्का फर्श है , जिस पर जाजम बिछा हुआ है। और रोज़दारो की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गयी , पक्की जगत के नीचे तक , जहाँ जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आ कर पीछे की कतार में खड़े हो जाते। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की नज़र में सब बराबर है। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था ! लाखो सर सजदे में एक साथ झुक जाते है , फिर सब के सब एक साथ खड़े हो जाते , एक झुकते है , और एक साथ घुटनो के बल बैठ जाते है। कई बार यही क्रिया होती है , जैसे बिजली की लाखो बत्तियां एक साथ प्रदीप्त हो और एक साथ बुझ जाये , और यही कर्म चलता रहा। कितना अपूर्व दृश्य था , जिसकी सामूहिक क्रियायें , विस्तार और अनंतता ह्रदय को श्रद्धा , गर्व और आत्मानंद से भर देती थी , मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोये हुए है। ” Story of munshi premchand “

2 (Story of munshi premchand )

नमाज़ खत्म हो गयी है। लोग आपस में गले मिल रहे है। तब मिठाई और खिलौनों की दुकानों पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालको से कम उत्साही नहीं है। यह देखो , हिंडोला है एक पैसा दे कर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते मालूम होंगे , कभी ज़मीन पर गिरते हुए। यह चर्खी है , लकड़ी के हाथी , घोड़े , ऊँट , छड़ो से लटके हुए है। एक पैसा दे कर बैठ जाओ और पच्चीस चक्कर का मज़ा लो। महमूद और मोहसीन , और नूरे और सम्मी इन घोड़ो और ऊँटों पर बैठते है। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास है। अपने कोष का एक तिहाई ज़रा – सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।

सब चर्खियों से उतरते है। अब खिलौने लेंगे। उधर दुकानों की कतार लगी हुई है। तरह – तरह के खिलौने है – सिपाही , गुजरिया , राजा और वकील , भिश्ती , धोबिन और साधु। वाह ! कितने सुन्दर खिलौने है। अब बोला ही चाहते है। महमूद सिपाही लेता है , ख़ाकी वर्दी और लाल पगड़ी वाला , कंधे पर बन्दुक रखे हुए , मालूम होता है , अभी कवायद किये चला आ रहा है। मोहसीन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है ,ऊपर मशक रखे हुई है , मशक का मुँह एक हाथ से पकडे हुए है। कितना प्रसन्न है ! शायद कोई गीत गा रहा है। बस मशक से पानी उड़ेलना ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्वमता है उसके मुख पर ! काला चोगा , नीचे सफ़ेद अचकन , अचकन के सामने की जेब में घड़ी , सुनहरी जंजीर , एक हाथ में कानून का पौधा लगाए हुए ,मालूम होता है , अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किये चला आ रहा है। यह सब दो – दो पैसे के खिलौने है। हामिद के पास कूल तीन पैसे है , इतने महंगे खिलौने वह कैसे ले ? खिलौना कही हाथ से छूट जाये तो चूर – चूर हो जाये। ज़रा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाये। ऐसे खिलौने लेकर क्या करेगा , किस काम के !

मोहसीन कहता है – मेरा भिश्ती रोज पानी दे जायेगा साँझ – सबेरे।

महमूद – और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फौरन बन्दुक से फैर कर देगा।

नूरे – और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।

सम्मी – और मरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।

हामिद खिलौनों की निंदा करता है – मिट्टी के ही तो है , गिरे तो चकनाचूर हो जाये , लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है की ज़रा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता , लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते है , विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचाता रह जाता।

खिलौनों के बाद मिठाइयां आती है , किसी ने रेवड़ियां ली है , किसी ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा। मज़े से खा रहे है। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे है। क्यों नहीं कुछ ले कर खाता ? ललचाई आँखों से सभी ओर देखता है।

मोहसीन कहता है – हामिद रेवाड़ी ले जा, कितनी ख़ुशबूदार है !

हामिद को संदेह हुआ , यह केवल क्रूर विनोद है , मोहसीन इतना उदार नहीं है , लेकिन यह जानकार भी वह उसके पास जाता है। मोहसीन दोने से एक रेवड़ी निकाल कर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलता है। मोहसीन रेवाड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद , नूरे , सम्मी खूब तालियाँ बजा कर हॅसते है। हामिद खिसिया जाता है।

मोहसीन – अच्छा , अबकी जरूर देंगे हामिद , अल्लाह कसम , ले जाव।

हामिद – रखे रहो , क्या मेरे पास पैसे नहीं है ?

सम्मी – तीन ही पैसे तो है। तीन पैसे में क्या – क्या लोगे ?

महमूद – हमसे गुलाबजामुन ले जाव हामिद। मोहसीन बदमाश है।

हामिद – मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयां लिखी है।

मोहसीन – लेकिन दिल से कह रहे होंगे कि मिले तो खा ले। अपने आपसे क्यों नहीं निकालते ?

महमूद – हम सब समझते है , इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जायेंगे , तो हमे ललचा – ललचाकर खायेगा।

मिठाइयों के बाद कुछ दुकाने लोहे की चीज़ो की , कुछ गिल्ट और कुछ नकली गहनों की। लड़को के लिए यह कुछ आकर्षक ना था। वे सब आगे बढ़ जाते है , हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियां उतारती है तो, हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा लेकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी ! फिर उनकी उंगलियाँ ना जलेंगी। घर में एक काम की चीज़ हो जाएगी। खिलौने से क्या फ़ायदा ? व्यर्थ में पैसे ख़राब होते है। ज़रा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई आँख उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते – पहुँचते टूट – फुट बराबर हो जायेंगे या छोटे बच्चे जो मेले में नहीं आये है ज़िद कर के ले लेंगे और तोड़ देंगे। चिमटा कितने काम की चीज़ है। रोटियाँ तवे से उतार लो , चूल्हे में सेक लो। अगर कोई आग माँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्माँ बेचारी कहाँ फुर्सत कि बाजार आये और इतने पैसे ही कहाँ मिलते है ? रोज हाथ जला लेती है। ” Story of premchand “

हामिद के साथी आगे बढ़ गए है। शबील पर सब – के सब शर्बत पी रहे है। देखो, सब कितने लालची है। इतनी मिठाईया ली , मुझे किसी ने एक भी नहीं दी। उस पर कहते है , मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करो। अब किसी ने कोई काम करने को कहा , पूछूँगा। खाये मिठाइयाँ आप मुँह सड़ेगा , फोड़े – फुंसियाँ निकलेंगी , आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से आपसे चुरायेंगे और मार खाएंगे और किताब झूठी बातें थोड़ी ही लिखी है। मेरी जबान क्यों ख़राब होगी ? अम्माँ चिमटा देखते ही दौड़ कर मेरे हाथ से चिमटा ले लेगी और कहेगी – मेरा बच्चा अम्माँ के लिए चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगो के खिलौनों पर कौन इन्हे दुआयें देगा ? बड़ो की दुआयें सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती है , और तुरंत सुनी जाती है। मेरे पास पैसे नहीं है। तभी तो मोहसीन और महमूद यु मिजाज दिखाते है ,मैं भी इनसे मिजाज दिखाऊंगा। खेले खिलौने और खाये मिठाइयाँ। मैं तो नहीं खेलता खिलौने , किसी का मिजाज क्यों सहुँ ? मैं गरीब सही किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता। आखिर अब्बाजान कभी ना कभी आएंगे। अम्माँ भी आएंगी ही , फिर इन लोगो से पूछूंगा , कितने खिलौने लोगे ? एक – एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ किस तरह सुलूक किया जाता है। यह नहीं की एक पैसे की रेवड़ियां ली , तो चिढ़ा – चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब खूब हॅसेंगे की हामिद ने चिमटा लिया है। हॅसे ! मेरी बला से। उसने दुकानदार से पूछा – यह चिमटा कितने का है ? ( Story of munshi premchand “)

दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ ना देखकर कहा – तुम्हारे काम का नहीं है जी !

‘ बिकाऊ है कि नहीं ? ‘

‘ बिकाऊ क्यों नहीं है ? और यहाँ क्यों लाद लाये है ? ‘

‘ तो बताते क्यों नहीं की पैसे का है ? ‘

‘ छः पैसे लगेंगे। ‘

हामिद का दिल बैठ गया।

‘ ठीक – ठीक पाँच पैसे लगेंगे , लेना है लो , नहीं तो चलते बनो। ‘

हामिद ने कलेजा मजबूत कर के कहा – तीन पैसे लोगे ?

यह कहता हुआ यह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ ना सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दी।

बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे कंधे पर इस तरह रखा , मानो बन्दूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियो के पास आया। ज़रा सुने , सबके सब क्या आलोचनाएं करते है !

मोहसीन ने हँसकर कहा – यह चिमटा क्यों लाये पगले , इसे क्या करेगा।

हामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटककर कहा – ज़रा अपना भिश्ती ज़मीन पर गिरा दो। सारी पसलियाँ चूर – चूर हो जाये बच्चू की।

महमूद बोला – तो यह चिमटा कोई खिलौना है ?

हामिद बोला – खिलौना क्यों नहीं है ! अभी कंधे पर रखा बन्दूक हो गयी। हाथ में ले लिया , फकीरो का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे का काम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ , तो तुम लोगो के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाए , मेरे चिमटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकते , मेरा बहादुर शेर है चिमटा।

सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला – मेरी खँजरी से बदलोगे ? दो आने की है।

हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा – मेरा चिमटा चाहे तो , तुम्हारी खँजरी का पेट फाड़ डाले। बस , एक चमड़े की झिल्ली लगा दी , ढब – ढब बोलने लगी। ज़रा -सा पानी लग जाये तो खत्म हो जाये। मेरा चिमटा आग में , पानी में , आँधी में ,तूफ़ान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।

चिमटे ने सबको मोहित कर लिया , अब आपसे किसके पास धरे है ? फिर मेले से दूर निकल आये है , नौ कब के बज गए ,धुप तेज़ हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही है। बाप से जिद भी करे तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।

अब बालको के दो दल हो गए है। मोहसीन , महमूद। सम्मी और नूरे एक तरफ है , हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रार्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हो गया ! दूसरे पक्ष से जा मिला , लेकिन मोहसीन , महमूद और नूरे भी हामिद से एक – एक , दो -दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आंतकित हो उठे है। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है , दूसरी ओर लोहा , जो इस वक़्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है , घातक है। अगर कोई शेर आ जाये तो मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जाये , मियाँ सिपाही मिट्टी की बन्दुक छोड़ के भागे , वकील साहब की नानी मर जाये , चोगे में मुँह छुपाकर ज़मीन पर लेट जाये। मगर यह चिमटा , यह बहादुर , यह रुस्तमे – हिन्द लपककर शेर की गर्दन पर सवार हो जायेगा और उसकी आँखें निकाल लेगा।

मोहसीन ने एड़ी – चोटी का ज़ोर लगाकर कहा – अच्छा पानी तो नहीं भर सकता ?

हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा – भिश्ती को एक डांट लगाएगा , तो दौड़ता हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।

मोहसीन परास्त हो गया , पर महमूद ने कुमुक पहुंचाई – अगर बच्चा पकड़ा जाये तो अदालत में बंधे – बंधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेंगे।

हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा हमे पकड़ने कौन आएगा ?

नूरे ने अकड़ कर कहा – यह सिपाही बन्दूक वाला।

हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा – यह बिचारे हम बहादुर रुस्तमे – हिंद को पकड़ेंगे ! अच्छा लाओ अभी ज़रा कुस्ती हो जाये। इसकी सूरत देख दूर से भागेंगे। पकड़ेंगे क्या बेचारे !

मोहसीन को एक नयी चोट सूझ गयी – तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में जलेगा।

उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जायेगा , लेकिन यह बात न हुई , हामिद ने तुरंत जवाब दिया – आग में बहादुर ही कूदते है जनाब , तुम्हारे यह वकील , सिपाही और भिश्ती लौंडियों की तरह घर में घुस जायेंगे ,आग में कूदना वह काम है , जो रुस्तमे – हिंद ही कर सकता है।

महमूद ने एक ज़ोर लगाया – वकील साहब कुर्सी – मेज पर बैठेंगे , तुम्हारा चिमटा तो बावरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहेगा।

इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया ! कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ! चिमटा बावरचीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है।

हामिद को कोई फडकता जवाब ना सूझा , तो उसने धांधली शुरू की – मेरा चिमटा बावरचीखाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे तो , जाकर उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा। ( Story of munshi premchand )

बात कुछ बनी नहीं। खासी गाली – गलौज थी , लेकिन कानून के पेट में डालने वाली बात छा गयी। ऐसी छा गयी की तीनो सुरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा कनकौआ ,किसी गंडेवाले कनकौआ को काट गया हो। कानून मुँह से निकलने वाली चीज़ है। उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना बेतुकी – सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रुस्तमे – हिन्द है। अब इसमें मोहसीन , महमूद , नूरे और सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।

विजेता को जो हारने वालो से जो सत्कार मिलना स्वाभाविक है , वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन – तीन , चार – चार आने पैसे खर्च किये , पर कोई काम की चीज़ ना ले सके। हामिद ने तीन पैसो में रंग जमा दिया। सच ही तो है , खिलौनों का क्या भरोसा ? टूट – फुट जायेंगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसो ?

संधि की शर्त तय होने लगी। मोहसीन ने कहा – ज़रा अपना चिमटा तो , हम भी देखे। तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो।

महमूद और नूरे ने भी अपने – अपने खिलौने।

हामिद को इन शर्तों मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी – बारी से सबके हाथ गया , और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ आये। कितने खूबसूरत खिलौने है, ” Story of munshi premchand “

हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे – मैं तुम्हे चिढ़ा रहा था , सच ! यह चिमटा , इन खिलौने की क्या बराबरी करेगा , मालूम होता है , अब बोलो , अब बोलो।

लेकिन मोहसीन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया है। चिपका टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।

मोहसीन – लेकिन इन खिलौने से कोई हमे दुआ तो ना देगा ?

महमूद – दुआ को लिए फिरते हो। उल्टे मार ना पड़े। अम्माँ जरूर कहेगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले ?

हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौने को देख कर किसी की माँ इतनी खुश ना होगी , जितनी दादी चिमटे को देख कर होगी। तीन पैसे में ही तो सबकुछ करना था और उन पैसो के इस उपयोग पर पछतावे की बिलकुल जरुरत ना थी। फिर अब तो रुस्तमे – हिन्द है और सभी खिलौनों का बादशाह।

रस्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दिए। महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गए . यह उस चिमटे का प्रसाद था।

3 ( Story of premchand )

ग्यारह बजे गाँव में हलचल मच गयी। मेलेवाले आ गये। मोहसीन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इसपर भाई – बहन में मार – पीट हुई। दोनों खूब रोये। उनकी अम्माँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो – दो चाटें और लगाए। ( ” Story of munshi premchand “ )

मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्टानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील ज़मीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता। मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में खूटियाँ गाड़ी गयी। उनपर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज की कालीन बिछाई गयी। वकील साहब राजा भोज की भाती सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालत में खस की टट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते है। क्या यहाँ मामूली पंखा भी ना हो ! कानून की गर्मी दिमाग चढ़ जाएगी कि नहीं ? बॉस का पंखा आया और नूरे पंखा करने लगे। मालूम नहीं , पंखे की हवा से या पंखे की चोट से स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया ! फिर बड़े ज़ोर – शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि धुरे पर डाल दी गयी। ( Short Stories of munshi premchand )

अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिला था , लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधरण व्यक्ति तो नहीं , तो अपने पैरों पर चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आयी , उसमे कुछ लाल रंग के फ़टे – पुराने चिथड़े बिछाये गए , जिसमे सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार के चक्कर लगाने लगा। उसके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘ छोनेवाले , जागते लहो ‘ पुकारते चलते है। मगर रात तो अँधेरी ही होनी चाहिए। महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूट कर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बन्दुक लिए जमीन पर आ जाते है। और उनकी एक टांग में विकार आ जाता है।

महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डॉक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिल गया है जिससे वह टूटी टांग को आनन – फानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए ! गूलर का दूध आता है। टाँग जवाब दे देती है। शल्य – क्रिया असफल हुई , तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम – से – कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टाँग से ना तो चल सकता था, ना बैठ सकता था। अब वह सिपाही सन्यासी हो गया। अपनी जगह पर बैठा – बैठा पहरा देता है। कभी – कभी देवता भी बन जाता है। उसके सर का झालरदार साफा खुरच दिया गया। अब उसका जितना रूपांतरण चाहो , कर सकते हो। कभी – कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है . ” Story of premchand “

अब मियाँ हामिद का हाल सुनिये। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथो में चिमटा देखकर वह चौकी।

‘ यह चिमटा कहाँ था ? ‘

‘ मैंने मोल लिया है।

‘ के पैसे में ?’

‘ तीन पैसे दिये। ‘

अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ , कुछ खाया न पिया। लाया क्या , चिमटा !

‘ सारे मेले में तुझे कोई और चीज़ ना मिली , जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया। ‘

हामिद ने अपराधी भाव से कहा – तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थी , इसलिए मैंने इसे लिया।

बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया , और स्नेह भी वह नहीं , जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दो में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था , खूब ठोस , रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग , कितना सद्भाव और कितना विवेक है ! दुसरो को खिलौने लेते और मिठाइयाँ खाते देख इसका मान कितना ललचाया होगा ? इतना जब्त इससे हुआ कैसे ? वहाँ भी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गदगद हो गया।

और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गयी। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआयें देती जाती थी और आँसू की बड़ी – बड़ी बूँदे गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता।

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